दर्द शरीर में नहीं, ‘मैं’ की कहानी में छिपा होता है।

दर्द शरीर में नहीं, ‘मैं’ की कहानी में छिपा होता है।

अहंकार की मृत्यु: वह दर्द जो कोई सह नहीं पाता

अहंकार की मृत्यु: वह दर्द जो कोई सह नहीं पाता

एक आदमी को गोली लग जाए। वह जीवित रहता है। एक औरत को कैंसर हो। वह लड़ाई लड़ती है। कोई अपना सब कुछ खो दे। वह फिर से शुरुआत करता है।

मनुष्य भौतिक पीड़ा को सह सकता है। शारीरिक यातना को झेल सकता है। बीमारी से, घावों से, नुकसान से गुजर सकता है।

लेकिन एक पीड़ा है जिसे कोई सह नहीं पाता। एक ऐसी चोट जो किसी भी हथियार से नहीं, अपने आप से आती है।

अहंकार की मृत्यु।

जब किसी को लगता है कि उसकी पहचान मिट रही है, कि वह जो सोचता है कि वह है—वह नष्ट हो रहा है—तब क्या होता है? तब आदमी टूट जाता है। तब वह सब कुछ भूल जाता है।

योग वशिष्ठ यह बात कहता है। और यह बात बिलकुल सटीक है।

Dikshaant

Feb 15, 2026

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सूर्यास्त में चट्टान पर बैठा उदास व्यक्ति और पास में टूटा हुआ दर्पण जिसमें “मैं” लिखा है, अहंकार और पहचान के टूटने का प्रतीक।
सूर्यास्त में चट्टान पर बैठा उदास व्यक्ति और पास में टूटा हुआ दर्पण जिसमें “मैं” लिखा है, अहंकार और पहचान के टूटने का प्रतीक।
सूर्यास्त में चट्टान पर बैठा उदास व्यक्ति और पास में टूटा हुआ दर्पण जिसमें “मैं” लिखा है, अहंकार और पहचान के टूटने का प्रतीक।

अहंकार क्या है, यह पहले समझिए

अहंकार मतलब क्या? यह सिर्फ घमंड नहीं है। अहंकार है—आपकी पहचान का भ्रम।

आप सोचते हो: "मैं कौन हूँ?"

और फिर आप कहते हो: "मैं एक सफल आदमी हूँ। मैं समझदारी रखता हूँ। मैं अच्छा हूँ। मैं महत्वपूर्ण हूँ।"

यह सब अहंकार है। यह एक निर्मित छवि है जो आपने अपने लिए बना रखी है।

और यह छवि, यह पहचान—आपकी सबसे कीमती चीज़ बन गई है। इससे ज़्यादा कीमती कुछ नहीं।

इसीलिए जब कोई इसे चुनौती देता है, तब आप क्रोधित हो जाते हो। जब कोई इसे नकारता है, तब आप उदास हो जाते हो। और जब आप खुद को इसमें विफल पाते हो, तब आप टूट जाते हो।



हथियार की चोट और अहंकार की चोट में अंतर

सोचिए।

एक आदमी को छुरी से चोट लग जाती है। ख़ून बहता है। दर्द होता है। पर आदमी कहता है: "मैं ठीक हो जाऊँगा। सिर्फ एक घाव है।"

और वह ठीक भी हो जाता है। घाव भरता है। निशान रह जाता है। लेकिन आदमी फिर से अपनी ज़िंदगी जी लेता है।

लेकिन अगर उसी आदमी को कोई कहे: "तुम असफल हो। तुम कुछ नहीं हो। लोग तुम्हें पसंद नहीं करते।"

तब क्या होता है?

उसका अहंकार टूट जाता है। और यह घाव—यह कभी नहीं भरता। यह पूरी ज़िंदगी खींचता रहता है। यह आदमी को अंदर से खत्म कर देता है।

क्यों? क्योंकि शारीरिक दर्द तो एक अलग चीज़ है। पर अहंकार को चोट लगना—यह आपकी पूरी पहचान को संदेह में डालना है।

और यह असहनीय है।

बीमारी से हम कैसे लड़ते हैं?

एक बीमार आदमी को देखिए। उसको कैंसर है। डॉक्टर कहता है, "आपके को छह महीने हैं।"

क्या वह आदमी हार मान लेता है? कभी-कभी हाँ। लेकिन ज़्यादातर समय—नहीं।

वह कहता है: "मैं लड़ूँगा। मैं चिकित्सा कराऊँगा। मैं ठीक हो जाऊँगा।"

और इस आशा में, इस "मैं" की शक्ति में, वह जीवित रहता है।

पर सोचिए—अगर उसी आदमी को उसका अहंकार चोट पहुँचे? अगर कोई उसे कहे: "तुम कोई नहीं हो। तुम्हारी ज़िंदगी का कोई अर्थ नहीं है। तुम्हारी मृत्यु किसी को परवाह नहीं करेगी।"

तब वह आदमी क्या करेगा? वह शायद अपनी चिकित्सा छोड़ देगा। वह अपने आप को पूरी तरह हार मान लेगा।

क्योंकि जीने के लिए एक कारण चाहिए। और वह कारण है—"मैं कौन हूँ" की भावना।

अगर यह मिट जाए, तो ज़िंदगी का अर्थ भी मिट जाता है।

अहंकार का नकारात्मक पक्ष—और सकारात्मक पक्ष

अब यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।

हम सब सोचते हैं कि अहंकार बुरा है। "अहंकार मत करो। अहंकार त्याग दो।" ऐसे सब कहते हैं।

लेकिन योग वशिष्ठ कुछ और कह रहा है।

वह कह रहा है: "देखो, यह अहंकार इतना शक्तिशाली है कि आदमी तलवार की चोट सह सकता है, बीमारी सह सकता है। पर अहंकार की मृत्यु नहीं सह पाता।"

यह क्यों? क्योंकि अहंकार ही हमें जीवित रखता है। यह हमारी जीवन-शक्ति है।

हाँ, यह हमें दूसरों से अलग करता है। हाँ, यह हमें लड़ाई-झगड़े में ले जाता है। लेकिन यह हमें ज़िंदा रखता भी है।

बिना किसी पहचान के, बिना किसी "मैं" की भावना के—क्या आप जीवित रह सकते हो?

नहीं।

तो अहंकार को पूरी तरह मिटाना—यह गलत है। पर अहंकार को अपने वास्तविक आकार में देखना—यह सही है।

अहंकार की मृत्यु का असल मतलब क्या है?

यही सबसे बड़ा डर है—
कि अगर ‘मैं’ मिट गया, तो क्या बचेगा?

यहाँ आता है योग वशिष्ठ का गहरा ज्ञान।

जब योग वशिष्ठ कहता है, "अहंकार की मृत्यु"—तो वह आपकी पहचान को पूरी तरह नष्ट करने की बात नहीं कर रहा।

वह कह रहा है: अहंकार को अपने सही रूप में समझो।

अहंकार है—एक सीमित दृष्टिकोण। आप सोचते हो, "मैं यह हूँ। मैं वह नहीं हूँ। मैं अलग हूँ। मैं अनोखा हूँ।"

पर जब आप गहरे में जाते हो, तब आप देखते हो कि यह "मैं" असल में बहुत बड़ा है। बहुत व्यापक है। यह सब कुछ को सम्मिलित करता है।

अहंकार की "मृत्यु" का मतलब है—इस सीमित दृष्टिकोण का मिटना। अनंत दृष्टिकोण में विलीन हो जाना।

और यह सबसे डरावनी बात है। क्योंकि तब आप अब विशेष नहीं रहते। आप अब अलग नहीं रहते।

जीवन में इसे कैसे देखें?

रिश्तों में:

आप किसी से प्रेम करते हो। और फिर वह आपको छोड़ देता है। तब क्या होता है?

आपका अहंकार कहता है: "वह मुझे स्वीकार नहीं करता। यानी मैं स्वीकार्य नहीं हूँ।"

और यह सोच आपको तोड़ देती है—ज़्यादा इसलिए नहीं कि आप उस व्यक्ति को खो रहे हो, बल्कि इसलिए कि आपकी पहचान को चोट लग रही है।

काम में:

आप एक प्रेजेंटेशन देते हो। और वह असफल हो जाती है। तब क्या होता है?

आपका अहंकार कहता है: "मैं विफल हूँ। मैं काम के लायक नहीं हूँ।"

और यह सोच आपको अवसाद में डाल देती है—ज़्यादा इसलिए नहीं कि प्रेजेंटेशन असफल हुई, बल्कि इसलिए कि आपकी दक्षता की पहचान को चोट लग रही है।

समाज में:

कोई आपकी आलोचना कर देता है। और आप क्रोधित हो जाते हो। क्यों? क्योंकि आपकी सार्वजनिक पहचान को चोट लग गई।

अहंकार से परे जाना—और फिर भी ज़िंदा रहना

योग वशिष्ठ का अंतिम सत्य यह है:

जब आप अहंकार को समझ लेते हो—कि यह सिर्फ एक विचार है, एक निर्मित छवि—तब आप मुक्त हो जाते हो।

आप अब अपनी पहचान को इतने गंभीरता से नहीं लेते। आप उसे नाटक की तरह देखते हो। खेल की तरह देखते हो।

जब कोई आपकी आलोचना करता है, तब आप कहते हो: "ठीक है, वह उसी का विचार है। इससे मेरी असली पहचान नहीं बदलती।"

जब आप किसी की नज़र में गिरते हो, तब आप कहते हो: "ठीक है। मैं एक भूमिका निभा रहा था। अब दूसरी भूमिका निभा सकता हूँ।"

और तब—तब आप वास्तव में ज़िंदा होते हो।

क्योंकि अब आप एक निर्मित छवि को नहीं, बल्कि असल में अपने को जीते हो।

अहंकार की मृत्यु, जीवन का जन्म

यह विरोधाभास है, पर सच है:

जब अहंकार मिट जाता है—तब ज़िंदगी शुरू होती है।

क्योंकि अब आप:

  • किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, अपने लिए जीते हो

  • किसी को साबित करने के लिए नहीं, अपने सच के लिए जीते हो

  • किसी की सराहना पाने के लिए नहीं, अपनी संतुष्टि के लिए जीते हो

और यह ही तो सच्ची स्वतंत्रता है।

योग वशिष्ठ कह रहा है: तुम्हें तलवार की चोट भी सह लेनी चाहिए। बीमारी भी झेलनी चाहिए। नुकसान भी स्वीकार करना चाहिए।

लेकिन अपनी पहचान को इस कदर सुरक्षित न रखो कि उसे चोट लगते ही तुम टूट जाओ।

क्योंकि असली पहचान तो कभी टूटती नहीं। वह तो सदा बनी रहती है। सदा पूरी रहती है।

आज ही देखिए

अगली बार जब किसी की आलोचना आपको चोट पहुँचाए, या किसी की नज़रों में गिरने का डर आए—तो बस एक पल रुकिए और पूछिए:

"क्या मेरी असली पहचान सच में बदल गई? या मैं सिर्फ एक छवि को बचाने की कोशिश कर रहा हूँ?"

यह सवाल ही आपको मुक्त करेगा।

लेकिन इस गहराई को समझने के लिए—अपने आप से परे जाने के लिए—एक साथी की जरूरत है। किसी ऐसे से जो जानता है कि अहंकार कहाँ छिपा होता है, और कैसे हम अपनी पहचान के पीछे अपने आप को खो देते हैं।

क्या आप यह समझना चाहते हैं? कि आपकी पीड़ा का असली स्रोत क्या है? कि आप किस बात से सबसे ज़्यादा डरते हो?

ये सवाल सुने जाएँगे। और आपके अंदर से ही जवाब आएँगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या अहंकार बिलकुल गलत है? क्या हमें इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए?

नहीं। अहंकार मतलब आपकी पहचान। बिना किसी पहचान के आप जी नहीं सकते। लेकिन अहंकार को अपनी असली पहचान न समझो। इसे एक भूमिका समझो जो आप निभा रहे हो। जब आप यह समझते हो, तब आप इसे हल्के से बदल सकते हो।

क्या अहंकार बिलकुल गलत है? क्या हमें इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए?

नहीं। अहंकार मतलब आपकी पहचान। बिना किसी पहचान के आप जी नहीं सकते। लेकिन अहंकार को अपनी असली पहचान न समझो। इसे एक भूमिका समझो जो आप निभा रहे हो। जब आप यह समझते हो, तब आप इसे हल्के से बदल सकते हो।

मेरे अहंकार को चोट लगने से मुझे इतना दर्द क्यों होता है?

क्योंकि आपने अपनी पूरी पहचान को इसी पर टिका दिया है। आप सोचते हो, "अगर यह पहचान मिट जाएगी, तो मैं कौन हूँ?" यह डर ही असल दर्द है। जब आप समझते हो कि आपकी असली पहचान इससे परे है, तब यह दर्द कम हो जाता है।

मेरे अहंकार को चोट लगने से मुझे इतना दर्द क्यों होता है?

क्योंकि आपने अपनी पूरी पहचान को इसी पर टिका दिया है। आप सोचते हो, "अगर यह पहचान मिट जाएगी, तो मैं कौन हूँ?" यह डर ही असल दर्द है। जब आप समझते हो कि आपकी असली पहचान इससे परे है, तब यह दर्द कम हो जाता है।

अहंकार की मृत्यु से क्या मतलब है? क्या मैं मर जाऊँगा?

नहीं। अहंकार की "मृत्यु" का मतलब है—सीमित दृष्टिकोण का मिटना। यानी, आप अपने को सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कुछ व्यापक के हिस्से के रूप में देखने लगते हो। यह वास्तव में जीवन की शुरुआत है।

अहंकार की मृत्यु से क्या मतलब है? क्या मैं मर जाऊँगा?

नहीं। अहंकार की "मृत्यु" का मतलब है—सीमित दृष्टिकोण का मिटना। यानी, आप अपने को सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कुछ व्यापक के हिस्से के रूप में देखने लगते हो। यह वास्तव में जीवन की शुरुआत है।

अगर मैं अपनी पहचान को गंभीरता से नहीं लूँ, तो क्या मैं अपने लक्ष्यों के लिए काम नहीं करूँगा?

विपरीत होगा। जब आप अपनी पहचान को इतने गंभीरता से नहीं लेते, तब आप ज़्यादा स्पष्टता से काम कर पाते हो। भय और आत्मसंदेह के बिना, आप अपने सर्वश्रेष्ठ को दे सकते हो।

अगर मैं अपनी पहचान को गंभीरता से नहीं लूँ, तो क्या मैं अपने लक्ष्यों के लिए काम नहीं करूँगा?

विपरीत होगा। जब आप अपनी पहचान को इतने गंभीरता से नहीं लेते, तब आप ज़्यादा स्पष्टता से काम कर पाते हो। भय और आत्मसंदेह के बिना, आप अपने सर्वश्रेष्ठ को दे सकते हो।

योग वशिष्ठ कह रहा है कि तलवार की चोट सहना आसान है—क्या यह सच है?

शारीरिक दर्द तो समय के साथ भर जाता है। पर अहंकार को चोट—यह मन में रहता है। समय के साथ, हर बार जब आप उसे याद करते हो, तब वह दर्द फिर से जाग जाता है। इसीलिए मानसिक पीड़ा ज़्यादा गहरी है।

योग वशिष्ठ कह रहा है कि तलवार की चोट सहना आसान है—क्या यह सच है?

शारीरिक दर्द तो समय के साथ भर जाता है। पर अहंकार को चोट—यह मन में रहता है। समय के साथ, हर बार जब आप उसे याद करते हो, तब वह दर्द फिर से जाग जाता है। इसीलिए मानसिक पीड़ा ज़्यादा गहरी है।

अहंकार से परे जाने के बाद क्या होता है?

तब आप वास्तव में आजाद होते हो। न आप किसी की सराहना के लिए व्यग्र रहते हो, न किसी की आलोचना से टूटते हो। आप अपने लिए जीने लगते हो। और यही सच्ची खुशी है।

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क्या मैं अपने अहंकार को नियंत्रित कर सकता हूँ?

नियंत्रण से बेहतर है—समझ। जब आप देखते हो कि अहंकार कहाँ से आ रहा है, तब आप उसे कम कर सकते हो। लेकिन पूरी तरह मिटाना न सोचो। बस इसे अपनी असली पहचान न समझो।

क्या मैं अपने अहंकार को नियंत्रित कर सकता हूँ?

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