आप सुबह जागते हो। बाहर देखते हो। क्या दिखता है? एक बाहरी दुनिया। घर, सड़क, लोग, आकाश।
पर सवाल है: क्या यह दुनिया आपके बाहर है, या आपके अंदर?
आप सोचते हो कि यह सब बाहर है। पर योग वशिष्ठ कहता है कुछ और। वह कहता है: यह पूरी दुनिया तुम्हारे अहंकार की ही एक निर्मिति है।
और यह बात सुनकर आपका मन करता है कि कहें, "यह तो पागलपन है!" लेकिन थोड़ा और गहरे सुनिए। यह बात आपके जीवन को पूरी तरह बदल सकती है।
Dikshaant
Feb 15, 2026
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अहंकार क्या है—बीज क्या है?
देखिए, एक बीज को लीजिए।
इस बीज में एक ताकत है। एक अदृश्य संभावना। और जब आप इसे मिट्टी में रोपते हो, तब क्या होता है? धीरे-धीरे, पूरा एक पेड़ बनता है। शाखाएँ, पत्तियाँ, फूल, फल।
लेकिन सब कुछ उसी बीज में था।
पेड़ वह नहीं था जो बाहर से आया। वह तो बीज के अंदर ही सोया हुआ था।
वैसे ही आपका अहंकार है।
अहंकार एक बीज है। और इस बीज में क्या है? "मैं" का भाव।
"मैं हूँ। मैं महत्वपूर्ण हूँ। मैं अलग हूँ। मुझे कुछ चाहिए। मुझे किसी से डर है। मुझे किसी से नफरत है।"
यह सब अहंकार के बीज से ही निकलता है। और फिर क्या होता है? यह बीज धीरे-धीरे बढ़ता है। और बढ़ते-बढ़ते, पूरी एक दुनिया बन जाती है।
"मैं" से संपूर्ण ब्रह्मांड बनता है
यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
जब आप सुबह उठते हो और कहते हो, "मैं हूँ"—तब इस "मैं" के साथ ही पूरी दुनिया का जन्म हो जाता है।
क्योंकि "मैं" हूँ, तो फिर:
"दूसरे" भी हैं। अगर मैं अलग हूँ, तो वह भी अलग हैं।
"मेरा" हो गया। मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा धन, मेरा सम्मान।
"दुश्मन" बन गए। कौन मेरी अच्छाई करने वाले हैं? कौन मेरे विरुद्ध हैं?
"भविष्य" बन गया। मेरी चिंता, मेरी योजना, मेरी आशाएँ।
"अतीत" बन गया। मेरी यादें, मेरी हार, मेरी सफलता।
सब कुछ "मैं" के इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
और जब तक आप "मैं" में हैं, तब तक यह पूरी दुनिया आपके लिए असल, ठोस, बहुत महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
लेकिन योग वशिष्ठ कहता है: यह सब "मैं" का ही खेल है।
मतलब क्या है "हर चीज़ का अर्थ अहंकार से आता है"?
यह सवाल महत्वपूर्ण है। तो सोचिए।
पैसा—इसका अर्थ क्या है?
पैसा तो सिर्फ कागज़ या धातु है। लेकिन आप इसे क्यों चाहते हो? क्योंकि आपका अहंकार कहता है, "इससे मैं सुरक्षित रहूँगा। इससे मैं महत्वपूर्ण दिखूँगा। इससे लोग मुझे पसंद करेंगे।"
तो पैसे का अर्थ क्या है? अहंकार की सुरक्षा और सम्मान।
प्रेम—इसका अर्थ क्या है?
प्रेम तो एक भावना है। लेकिन आप किसे प्रेम करते हो? किसे अपनाते हो? उसे जो आपका अहंकार संतुष्ट करता है। जो आपको अच्छा महसूस कराता है। जो आपकी पहचान को बढ़ाता है।
तो प्रेम का अर्थ क्या है? अहंकार की सुख और पूर्णता।
सम्मान—इसका अर्थ क्या है?
सम्मान तो लोगों की प्रशंसा है। लेकिन आप इसे क्यों चाहते हो? क्योंकि आपका अहंकार कहता है, "अगर लोग मेरी प्रशंसा करें, तो मैं कोई हूँ। मेरा अस्तित्व है।"
तो सम्मान का अर्थ क्या है? अहंकार की पुष्टि और अस्तित्व।
देखा?
हर चीज़ का हर अर्थ अहंकार से ही आता है। बिना अहंकार के, किसी चीज़ का कोई अर्थ ही नहीं।
अगर अहंकार नहीं होता, तो?
अब एक विचार करिए।
अगर आप अहंकार के बिना होते—अगर "मैं" की भावना ही न होती—तब क्या होता?
तब:
पैसा सिर्फ पैसा होता। न सुरक्षा, न सम्मान। बस एक वस्तु।
दूसरे लोग सिर्फ दूसरे लोग होते। न दुश्मन, न मित्र। बस अन्य अस्तित्व।
समय सिर्फ समय होता। न अतीत की चिंता, न भविष्य की योजना। बस यह पल।
शरीर सिर्फ शरीर होता। न "मेरा" शरीर, न "मुझे दिखने में कैसी लगता हूँ"। बस एक रचना।
और दुनिया?
दुनिया विलीन हो जाती। या कम से कम, वह एक बिलकुल अलग जगह होती।
क्योंकि दुनिया तुम्हारे लिए उतनी ही वास्तविक है, जितना तुम्हारा अहंकार इसे वास्तविक बनाता है।
यह कोई अमूर्त दर्शन नहीं है—यह व्यावहारिक है
अब सवाल यह है: यह सब बातें तो ठीक हैं, पर इससे मेरे जीवन में क्या फर्क पड़ता है?
बहुत फर्क।
रिश्तों में:
आप किसी को देखते हैं, और तुरंत अपने अहंकार को सक्रिय कर देते हो। वह आदमी कैसा दिखता है? क्या वह मुझे पसंद करेगा? क्या वह मेरे को महत्वपूर्ण मानेगा?
तो आपका पूरा रिश्ता अहंकार के इर्द-गिर्द घूमता है। आप उस व्यक्ति को सीधे नहीं देखते, बल्कि अपने अहंकार के लेंस से देखते हो।
लेकिन अगर आप अहंकार को हटा दें? तब आप उस इंसान को असल में देख पाते हो। उसकी असली ज़रूरत, असली दर्द, असली सुंदरता।
और तब रिश्ता वास्तविक हो जाता है।
काम में:
आप एक प्रोजेक्ट लेते हो। लेकिन मन में क्या चलता है? "मैं यह अच्छे से करूँ, तो मेरी छवि अच्छी रहेगी। मेरा बोनस बढ़ेगा। मेरे को प्रमोशन मिलेगा।"
तो आपका काम पूरी तरह अहंकार से संचालित होता है। और जब प्रशंसा नहीं मिलती, तब आप टूट जाते हो। या गुस्से में आ जाते हो।
लेकिन अगर आप अहंकार को हटा दें? तब आप काम के लिए काम करते हो। क्योंकि वह काम सार्थक है, न कि क्योंकि इससे आपकी छवि बनती है।
और तब आप सच में अच्छा काम करते हो। और वह प्राकृतिक रूप से सराहे जाता है।
जीवन में:
जब आप बिना अहंकार के होते हो, तब क्या होता है? कोई चिंता नहीं। कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं। कोई तुलना नहीं।
आप बस... जी लेते हो।
और यह जीवन—बिना अहंकार का जीवन—यह सबसे सुंदर, सबसे शांत जीवन है।
अहंकार को उखाड़ना—लेकिन कैसे?
योग वशिष्ठ कहता है: "अहंकार को उखाड़ दो, और दुनिया भी उखड़ जाएगी।"
तो अहंकार को उखाड़ते कैसे हो?
पहला: देखना।
अहंकार को देखो। उसे अपने जीवन में देखो। जब तुम गुस्से में हो, तो क्या तुम्हारा अहंकार चोट खा रहा है? जब तुम दुखी हो, तो क्या तुम्हारी पहचान को नकारा जा रहा है?
बस देखते रहो। बिना किसी निर्णय के। बिना किसी प्रतिरोध के।
दूसरा: समझना।
जब तुम इसे देखते हो, तब तुम समझने लगते हो कि यह अहंकार असल में है ही नहीं। यह एक सपने जैसा है। एक खेल है।
और जब तुम समझते हो कि यह खेल है, तब तुम इसे हल्के से लेने लगते हो।
तीसरा: विलीन करना।
जैसे-जैसे आप देखते हो, समझते हो—धीरे-धीरे अहंकार विलीन हो जाता है। न कि बलपूर्वक, बल्कि प्राकृतिक रूप से।
जैसे सूर्य निकलता है, तो अंधकार अपने आप हट जाता है।
वह दुनिया जो "अहंकार-मुक्त" होती है
जब अहंकार विलीन हो जाता है, तब दुनिया भी विलीन हो जाती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप मर जाते हो, या पागल हो जाते हो।
इसका मतलब है:
आप अब अकेले नहीं देखते, बल्कि सब कुछ में एकता देखते हो
आप अब अपने लिए नहीं जीते, बल्कि सब के लिए जीते हो
आप अब चीज़ों को चाहते नहीं, बल्कि सब कुछ को स्वीकार करते हो
आप अब भविष्य की चिंता नहीं करते, बल्कि वर्तमान में पूरी तरह होते हो
और यही तो स्वर्ग है। न कि कोई बाहरी जगह, बल्कि एक आंतरिक अवस्था।
योग वशिष्ठ का अंतिम संदेश
योग वशिष्ठ कह रहा है: तुम्हारी दुनिया तुम्हारा ही निर्माण है। और यह निर्माण अहंकार पर आधारित है।
तुम जब तक "मैं" में हो, तब तक तुम्हारी दुनिया असली दिखाई देगी। तुम जब तक अहंकार को पूरी तरह समझ नहीं लो, तब तक तुम उससे मुक्त नहीं हो पाओगे।
लेकिन जब तुम समझ लो कि यह सब एक सपना है—एक अहंकार का खेल—तब?
तब तुम मुक्त हो जाओ। और दुनिया भी तुम्हारे लिए अर्थहीन हो जाए। न बुरी, न अच्छी। बस... है।
और यह ही तो आज़ादी है।
आज ही शुरू करिए
अगली बार जब आप अपने अहंकार को सक्रिय पाएँ—जब आप गुस्से में हों, या किसी की प्रशंसा की चाह में हों, या किसी को नीचा दिखाना चाहते हों—तो बस रुकिए।
और पूछिए: "क्या यह सब मेरे अहंकार के इर्द-गिर्द है? क्या मैं अपने असल को नहीं, बल्कि एक निर्मित छवि को बचा रहा हूँ?"
यह सवाल ही आपको देखना सिखाएगा। और जब आप देखने लगते हो, तब विलीन होना अपने आप शुरू हो जाता है।
लेकिन अगर आप चाहते हो कि यह समझ गहराई से आए, कि आप अपने अहंकार को पूरी तरह समझें—तो एक साथी की जरूरत है। किसी ऐसे से जो जानता है कि अहंकार के किस कोने में छिपे होते हैं, कि हम अपने को कितने अलग तरीकों से धोखा देते हैं।
क्या आप यह जानना चाहते हैं? कि आपकी दुनिया वास्तव में क्या है? कि आपका अहंकार कहाँ काम करता है?
ये सवाल सुने जाएँगे। और आप अपने ही अंदर से जवाब खोज पाएँगे।








