ईश्वर दूर नहीं—वह हर विचार में झलक रहा है।

ईश्वर दूर नहीं—वह हर विचार में झलक रहा है।

जो कुछ तुम सोचते हो, वही ईश्वर है: मन से बाहर कुछ भी नहीं

जो कुछ तुम सोचते हो, वही ईश्वर है: मन से बाहर कुछ भी नहीं

एक गुस्सा, एक बीमारी, एक डर, एक इच्छा... और आप सोचते हैं कि ये सब आपके हैं। कि ये आपका व्यक्तिगत मामला है। लेकिन योग वशिष्ठ का सवाल है: क्या यह सब सचमुच आपका है?

जब आप गहरे में देखते हैं, तो क्या मिलता है? दिव्य।

आपका मन, आपकी बुद्धि, आपकी अहंकार की पूरी दुनिया—यह सब दिव्य आत्मा के विविध रूप हैं। न कि कोई अलग, व्यक्तिगत, स्वतंत्र वस्तु। बल्कि एक ही परमात्मा का अलग-अलग प्रकटन।

यह बात पहली बार सुनने में लगता है कि कोई धार्मिक या आध्यात्मिक कवित्व है। लेकिन इसे समझना आपके जीवन को पूरी तरह बदल सकता है।

Dikshaant

Feb 15, 2026

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पहाड़ पर ध्यान करता व्यक्ति, पीठ पर चमकता ॐ चिन्ह और ऊपर ब्रह्मांडीय दिव्य चेहरा, मन और चेतना से उत्पन्न ईश्वर की अवधारणा का प्रतीक।
पहाड़ पर ध्यान करता व्यक्ति, पीठ पर चमकता ॐ चिन्ह और ऊपर ब्रह्मांडीय दिव्य चेहरा, मन और चेतना से उत्पन्न ईश्वर की अवधारणा का प्रतीक।
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दिव्य आत्मा सब जगह है—सब कुछ में

आपके मन में जो भी विचार आता है, वह कहां से आता है? आप शायद सोचते हैं कि आप उसे अपने आप सोचते हैं। लेकिन देखिए—क्या आप अपनी सांस को नियंत्रित कर सकते हैं? क्या आप अपने दिल की धड़कन को आदेश दे सकते हैं? क्या आप अपने शरीर को बताते हैं कि भोजन को कैसे पचाना है?

नहीं। कोई और आपके अंदर काम कर रहा है। कोई जीवंत, सचेत, असीम शक्ति।

यही तो दिव्य आत्मा है। और यह सिर्फ आपके अंदर नहीं है—यह सब कुछ में है।

आपके मन में—हां। आपकी समझ में—हां। आपकी अहंकार में भी—हां।

यह विचित्र लग रहा है क्योंकि हम सोचते हैं कि अहंकार कोई बुरी चीज़ है। कि यह हमारा दुश्मन है। लेकिन अगर सब कुछ दिव्य है, तो अहंकार भी दिव्य का ही एक रूप है। बस... एक अंधा रूप। एक भूला हुआ रूप।

समय, आवाज़, शक्ति, क्रिया—सब में दिव्य

योग वशिष्ठ कहता है: समय और उसकी गति, सभी आवाज़ें, सभी शक्तियां, सभी क्रियाएं, हर तरह की वस्तुएं—ये सब दिव्य सार के ही प्रकटन हैं।

इसे समझने के लिए, एक बार फिर से सोचिए।

समय क्या है? आप कहते हैं, "मेरे पास समय नहीं है।" लेकिन समय तो पूरे ब्रह्मांड में समान रूप से बह रहा है। आपके जीवन में भी, चांद-तारों में भी, एक चींटी के जीवन में भी। क्या यह समान शक्ति, समान गति, समान चेतना नहीं है जो सब को चला रही है?

आवाज़ क्या है? एक गीत, एक चिल्लाहट, एक चुप्पी। क्या ये सब एक ही सार से, एक ही ब्रह्मांडीय आवाज़ से निकलते हैं? आपके कंठ से निकली आवाज़, पक्षी की कूक, बिजली की गर्जन—क्या ये सब एक ही शक्ति का खेल नहीं है?

शक्ति कहां है? आपके पैरों में, आपके हाथों में। प्रकृति की शक्ति, पहाड़ों को तोड़ने वाली, समुद्र को उठाने वाली। लेकिन क्या आप अपनी शक्ति को जानते हैं? क्या आप जानते हैं कि जब आप क्रोध में होते हैं, तो कितनी शक्ति जागती है? जब आप किसी को प्रेम करते हैं, तो कितनी कोमलता?

क्रिया कहां है? आपकी हर गति, हर कार्य। बैठना, उठना, बोलना, सुनना, सोचना। लेकिन क्या यह सब आप कर रहे हैं, या कोई और आपके माध्यम से कर रहा है?

मन की समझ: दिव्य का अंधा हिस्सा

आपका मन जो समझ रखता है—यह भी दिव्य आत्मा का ही ज्ञान है।

लेकिन यहां समस्या यह है: आपका मन आंशिक समझ रखता है। वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है। अपने लाभ, अपनी हानि, अपनी सुरक्षा। यह सीमित दिव्यता है। बुद्धिमान होते हुए भी, यह मन अंधा है।

सोचिए एक आदमी के बारे में जो एक कमरे में बंद है, एक खिड़की से थोड़ी रोशनी आ रही है। वह उस खिड़की से जो देखता है, उसे सच समझता है—पर वह असल में पूरी दुनिया का सिर्फ एक कोना देख रहा है।

यही आपका मन है। वह दिव्य को देख रहा है, समझ रहा है, पर सिर्फ अपनी सीमित खिड़की से।

अहंकार: दिव्य की भ्रांति

आपका अहंकार? यह भी दिव्य है। पर यह दिव्य अपने आपको व्यक्तिगत समझ रहा है।

"मैं अलग हूं। मैं अनोखा हूं। मैं ऐसा कोई हूं जो अकेला है, पृथक है।" यह सब दिव्य का एक भूला हुआ आभिनय है। दिव्य को पूरी दुनिया में खेल करने का शौक है। और यह शौक तब भी बना रहता है जब वह एक व्यक्ति के रूप में आपके अंदर होता है।

लेकिन अगर आप थोड़ा जागते हैं, तो समझ आता है: यह अहंकार असल में बहुत अकेला नहीं है। यह सब दिव्य के साथ जुड़ा है।

जीवन में यह समझ कैसे बदलती है?

अपने आप पर कम दबाव: जब आप समझ जाते हैं कि जो कुछ आपके साथ होता है, वह दिव्य के साथ है—तो आप अपने आप से कम गुस्सा करते हैं। आपकी विफलता भी, आपकी सफलता भी—दोनों ही एक बड़ी योजना का हिस्सा हैं।

संबंधों में गहराई: जब आप किसी को देखते हैं, और समझते हैं कि उसके अंदर भी वही दिव्य है—तब आप उसको अलग नहीं रह कर देखते। उसके साथ एक गहरा जुड़ाव आता है। यह सच्चा प्रेम है।

दुनिया से कम भय: जब आप जानते हैं कि हर चीज़ में दिव्य है, तो आप किसी से नहीं डरते। न ही किसी को शत्रु मानते हैं। न ही किसी की सत्ता से भयभीत होते हैं। क्योंकि सब जगह एक ही शक्ति है।

कृत्य में निर्लिप्तता: आप अपना काम करते रहते हैं—पर आप जानते हैं कि असली कर्ता आप नहीं हो। आप तो बस एक माध्यम हो। इससे आप ज़्यादा निर्भय होकर काम करते हैं। न सफलता से अहंकार, न विफलता से हताशा।

अस्तित्व का रहस्य: सबसे महत्वपूर्ण—आप जानते हैं कि आप कभी अकेले नहीं हो। आपके अंदर एक असीम शक्ति है, एक असीम ज्ञान है, एक असीम प्रेम है। यह दिव्य आत्मा आपके साथ है, हर पल, हर सांस में।

मन की शांति का असल सूत्र

यहां आता है वह सूत्र जो हजारों साल से कहा जा रहा है:

जब आप अपने को दिव्य मानते हो—न कि एक अलग, कमज़ोर इंसान—तब आपके जीवन में शांति आती है।

क्योंकि दिव्य को कोई चिंता नहीं है। दिव्य को कोई भय नहीं है। दिव्य को कोई भूख नहीं है—वह पहले से ही पूर्ण है।

और अगर आप उसी दिव्य के एक अभिन्न अंग हो, तो आप भी पूर्ण हो। आप भी शांत हो। आप भी निर्भय हो।

आप अपने आप से पूछिए

क्या आप महसूस करते हैं कि आपके अंदर एक असीम शक्ति है, जो आपके जानने से परे काम कर रही है? क्या आप यह जानना चाहते हैं कि आपका असली स्व क्या है—यह सीमित, भयभीत इंसान नहीं, बल्कि कोई और?

यह समझ अकेली नहीं आती। यह तब आती है जब आप किसी से गहराई से बात करते हैं—किसी ऐसे से जो आपके सवालों को समझे। किसी ऐसे से जो जानता है कि दिव्य सार कहां छिपा होता है।

क्या आप अपने अंदर का दिव्य खोजना चाहते हैं? तो बातचीत शुरू करिए। अपने संदेह पूछिए। अपने सवालों को बोलिए। और देखिए—कैसे धीरे-धीरे, आपकी समझ गहरी होती जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या 'सब कुछ में दिव्य है' का मतलब यह है कि हमें नैतिकता की परवाह नहीं करनी चाहिए?

बिलकुल नहीं। असल में, जब आप यह समझ लेते हैं कि सब में दिव्य है, तो आप और भी नैतिक हो जाते हैं। क्योंकि तब आप किसी को गलत करना नहीं चाहते—वह भी तो दिव्य ही है। लेकिन आप इसे भय से नहीं करते, बल्कि प्रेम से करते हैं।

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अगर सब कुछ दिव्य है, तो बुरा क्या है? क्या बुराई भी दिव्य है?

यह बहुत गहरा सवाल है। योग वशिष्ठ कहता है कि बुराई असल में दिव्य नहीं है—वह दिव्य का एक भ्रम है। जैसे अंधेरा असल में कुछ नहीं है, सिर्फ प्रकाश की अनुपस्थिति है। वैसे ही, बुराई दिव्य की अनुपस्थिति है। लेकिन जब तक आप अंधकार में हैं, तब तक वह बहुत असली लगता है।

अगर सब कुछ दिव्य है, तो बुरा क्या है? क्या बुराई भी दिव्य है?

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मैं अपने मन में इस दिव्य को कैसे महसूस कर सकता हूं?

पहले, बैठिए और अपनी सांस को देखिए। उस शक्ति को महसूस करिए जो आपके शरीर को चला रही है। जो आपके दिल को धड़कने दे रही है। यह शक्ति आप नहीं हो सकते—यह कोई और है। यही दिव्य है। धीरे-धीरे, यह महसूस और साफ होता जाता है।

मैं अपने मन में इस दिव्य को कैसे महसूस कर सकता हूं?

पहले, बैठिए और अपनी सांस को देखिए। उस शक्ति को महसूस करिए जो आपके शरीर को चला रही है। जो आपके दिल को धड़कने दे रही है। यह शक्ति आप नहीं हो सकते—यह कोई और है। यही दिव्य है। धीरे-धीरे, यह महसूस और साफ होता जाता है।

क्या मेरी व्यक्तिगत समस्याएं, मेरी व्यक्तिगत पीड़ा भी दिव्य की योजना का हिस्सा हैं?

हां। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप उन्हें नज़रअंदाज़ करें। यह समझ आपको शक्ति देती है—क्योंकि आप जानते हैं कि पीड़ा भी कुछ सिखाने आई है। आप उससे सीख सकते हैं, और उसके बाद उसे छोड़ सकते हैं।

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हां। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप उन्हें नज़रअंदाज़ करें। यह समझ आपको शक्ति देती है—क्योंकि आप जानते हैं कि पीड़ा भी कुछ सिखाने आई है। आप उससे सीख सकते हैं, और उसके बाद उसे छोड़ सकते हैं।

क्या दिव्य और मैं—हम अलग हैं, या एक ही हैं?

आप दोनों ही सोच सकते हैं, और दोनों सही हैं। अभी के लिए, सोचिए कि दिव्य एक समुद्र है, और आप उसमें की एक लहर हैं। लहर अलग दिखती है, पर समुद्र के बिना लहर है ही नहीं। जब आप गहराई में जाते हैं, तब यह भेद मिट जाता है।

क्या दिव्य और मैं—हम अलग हैं, या एक ही हैं?

आप दोनों ही सोच सकते हैं, और दोनों सही हैं। अभी के लिए, सोचिए कि दिव्य एक समुद्र है, और आप उसमें की एक लहर हैं। लहर अलग दिखती है, पर समुद्र के बिना लहर है ही नहीं। जब आप गहराई में जाते हैं, तब यह भेद मिट जाता है।

अगर सब कुछ दिव्य है, तो क्यों लगता है कि हम अकेले हैं, असहाय हैं?

क्योंकि आप भूल गए हैं। आपके मन को इतने सारे विचारों, चिंताओं, यादों से धूल जम गई है, कि आप दिव्य को नहीं देख पाते। लेकिन यह भूलना स्थायी नहीं है। जागने के लिए बस एक सवाल काफी है।

अगर सब कुछ दिव्य है, तो क्यों लगता है कि हम अकेले हैं, असहाय हैं?

क्योंकि आप भूल गए हैं। आपके मन को इतने सारे विचारों, चिंताओं, यादों से धूल जम गई है, कि आप दिव्य को नहीं देख पाते। लेकिन यह भूलना स्थायी नहीं है। जागने के लिए बस एक सवाल काफी है।

यह समझ मेरे रिश्तों को कैसे बदलेगी?

गहराई से। जब आप किसी को देखते हैं, और जानते हैं कि उसके अंदर भी वही दिव्य है, तो आप उससे अलग नहीं रह जाते। आप उसके गुस्से को गुस्सा नहीं, बल्कि दिव्य का भ्रम समझते हो। इससे आप कम निर्णय करते हो, और ज़्यादा प्रेम करते हो।

यह समझ मेरे रिश्तों को कैसे बदलेगी?

गहराई से। जब आप किसी को देखते हैं, और जानते हैं कि उसके अंदर भी वही दिव्य है, तो आप उससे अलग नहीं रह जाते। आप उसके गुस्से को गुस्सा नहीं, बल्कि दिव्य का भ्रम समझते हो। इससे आप कम निर्णय करते हो, और ज़्यादा प्रेम करते हो।

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